बनारस न्यूज डेस्क: करीब 193 साल पहले ब्रिटिश विद्वान और कलाकार जेम्स प्रिन्सेप ने ‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ नाम की एक किताब तैयार की थी। इसमें वाराणसी के घाटों, मंदिरों, मस्जिदों, महलों और उस समय के आम लोगों की जिंदगी को 34 चित्रों के जरिए दिखाया गया था। अब इस दुर्लभ किताब की एक हस्ताक्षर वाली कॉपी नीलामी में 36.76 लाख रुपये में बिकी है। खास बात यह है कि इसकी अधिकतम अनुमानित कीमत 10 लाख रुपये रखी गई थी, लेकिन इसे उससे तीन गुना से भी ज्यादा कीमत मिली।
नीलामी कंपनी आस्तागुरु के मुताबिक, यह किताब 24 से 26 फरवरी 2026 के बीच हुई ‘इम्पीरियल ट्रेजर्स’ नीलामी का हिस्सा थी। इसकी कॉपी 36,75,978 रुपये में बिकी, जिसमें खरीदार की ओर से दी जाने वाली फीस भी शामिल है। 68 पन्नों की यह किताब कोलकाता के बैपटिस्ट मिशन प्रेस में छपी थी। इसमें 19वीं सदी की शुरुआत के बनारस की तस्वीरें हैं, जिनमें गंगा किनारे की इमारतों के साथ पूजा-पाठ करते और रोजमर्रा के कामों में लगे लोग भी नजर आते हैं।
जेम्स प्रिन्सेप ने कैसे दिखाई पुराने बनारस की झलक?
जेम्स प्रिन्सेप का जन्म 1799 में हुआ था। वह कलाकार होने के साथ वास्तुकला, सिक्कों और पुराने शिलालेखों के अध्ययन में भी रुचि रखते थे। वह 1820 में बनारस आए थे और यहां सिक्कों की शुद्धता जांचने वाले अधिकारी के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने शहर की इमारतों, धार्मिक स्थलों और लोगों की जिंदगी को करीब से समझा। उन्होंने 1820 से 1825 के बीच कई चित्र बनाए, जिन्हें बाद में छपाई की अलग-अलग तकनीकों से तैयार करके 1831 से 1833 के बीच किस्तों में प्रकाशित किया गया। बाद में इन चित्रों और उनके विवरण को एक किताब में इकट्ठा किया गया।
प्रिन्सेप ने किताब की भूमिका में बताया था कि उनका मकसद यूरोप के शहरों की मशहूर तस्वीरों से मुकाबला करना नहीं था। वह बस बनारस को वैसा ही दिखाना चाहते थे, जैसा उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उनके मुताबिक, इस काम में सबसे जरूरी बात शहर को ईमानदारी से चित्रों में उतारना था।
घाटों से मंदिरों तक, चित्रों में कैद है पुराना बनारस
‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ में मणिकर्णिका घाट, विश्वेश्वर मंदिर और अन्नपूर्णा मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों की झलक मिलती है। एक चित्र में अन्नपूर्णा मंदिर में एक उपदेशक को धार्मिक ग्रंथ समझाते हुए दिखाया गया है, जबकि दूसरे चित्र में एक ब्राह्मण को पवित्र स्थान पर माला चढ़ाते हुए दिखाया गया है। किताब में गंगा तक जाने वाली सीढ़ियों, नदी किनारे बनी इमारतों, मंदिरों, मस्जिदों और मंडपों के चित्र भी शामिल हैं।
इन चित्रों की खास बात यह है कि इनमें सिर्फ इमारतों को नहीं दिखाया गया, बल्कि उन जगहों पर लोगों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों को भी जगह मिली है। घाटों पर मौजूद लोग, पूजा-पाठ और रोजमर्रा के काम उस दौर के बनारस की तस्वीर पेश करते हैं। इन चित्रों की मदद से इतिहासकार यह समझ सकते हैं कि 19वीं सदी की शुरुआत में शहर की बनावट और नदी किनारे की जिंदगी कैसी थी। हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि प्रिन्सेप ब्रिटिश शासन के दौर के एक विदेशी पर्यवेक्षक थे। इसलिए उनके चित्रों और विवरणों में उस समय की सोच और नजरिए का असर भी हो सकता है।
हस्ताक्षर वाली दुर्लभ किताब की क्यों है खास अहमियत?
आस्तागुरु के मुताबिक, नीलामी में बिकी किताब पर जेम्स प्रिन्सेप के हस्ताक्षर थे। इसमें 68 पन्नों पर 34 चित्र दिए गए हैं और इसका आकार करीब 18.5 x 13.5 इंच है। नीलामी कंपनी ने इसे किसी भारतीय शहर का शुरुआती और महत्वपूर्ण चित्रात्मक दस्तावेज बताया है। इसमें तस्वीरों के साथ लिखे गए विवरण भी हैं, जो इसे कला और इतिहास दोनों के लिहाज से खास बनाते हैं।
इस किताब को तैयार करने में उस दौर के दूसरे कलाकारों का भी योगदान था। आस्तागुरु के अनुसार, चित्रों को छपाई के लिए तैयार करने वालों में लुई हागे भी शामिल थे। नीलामी में बिकी कॉपी पर इस्तेमाल और उम्र के कारण कुछ निशान थे, लेकिन इसके बावजूद इसे 8 से 10 लाख रुपये के अनुमान के मुकाबले करीब 36.76 लाख रुपये मिले।