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अमेरिका-ईरान ऐतिहासिक परमाणु समझौते के पीछे के कूटनीतिक मायने: ट्रंप क्यों चाहते थे ईरान के 'हथियार-ग्रेड यूरेनियम' का पूर्ण खात्मा?

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Posted On:Thursday, June 18, 2026

18 जून 2026 को हस्ताक्षरित हुए अमेरिका-ईरान के बीच ऐतिहासिक 14-सूत्री समझौते (Islamabad MoU) ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। इस पूरे समझौते की सबसे कूटनीतिक और केंद्रीय शर्त यह है कि ईरान भविष्य में कभी भी परमाणु हथियार न तो खरीदेगा, न विकसित करेगा और न ही उनका निर्माण करेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस विलेख क्लॉज को अपनी विदेश नीति की '99.9 प्रतिशत' सबसे बड़ी रणनीतिक कामयाबी घोषित किया है। हालांकि, वैश्विक रक्षा विश्लेषक इस बात का गहन अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर वाशिंगटन के लिए ईरान को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनने से रोकना इतना अनिवार्य क्यों था और क्या वाकई ईरान अमेरिकी संप्रभुता के लिए कोई सीधी चुनौती बन सकता था।

वास्तव में, अमेरिका के इस कड़े रुख के पीछे गहरे रणनीतिक और विधिक कारण छिपे हुए हैं। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए संयुक्त सैन्य अभियान का प्राथमिक एजेंडा ही ईरान के परमाणु ठिकानों को ध्वस्त करना था। ट्रंप पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा साल 2015 में किए गए संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) को एक कमजोर 'सड़क' मानते थे, जिससे ईरान को परमाणु महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाने का रास्ता मिला था। यही वजह है कि ट्रंप ने साल 2018 में उस समझौते को रद्द कर दिया था और अब वह अपने नाम से एक ऐसी विखंडन 'दीवार' खड़ी करना चाहते थे, जो ईरान को परमाणु हथियारों से हमेशा के लिए दूर रखे।

एक अन्य बड़ा कारण ईरान की 'दहलीज स्थिति' (Threshold Status) थी। युद्ध की शुरुआत से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) ने खुलासा किया था कि ईरान के पास 440.9 किलोग्राम तक 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम का जखीरा मौजूद है, जो 10 परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त था। चूंकि 60 प्रतिशत से 90 प्रतिशत (वेपन-ग्रेड) संवर्धन का फासला बेहद कम होता है, इसलिए अमेरिका ने कूटनीतिक दबाव बनाकर इस अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजने या नष्ट करने की विधिक शर्त मनवाई। इसके अलावा, अमेरिका को डर था कि परमाणु छत्रछाया मिलने के बाद ईरान मध्य पूर्व में सक्रिय अपने प्रॉक्सी समूहों, जैसे हिजबुल्लाह, को और अधिक आक्रामक बना देगा। अंततः, यदि ईरान अमेरिकी हमलों के बावजूद परमाणु शक्ति बन जाता, तो यह वैश्विक मंच पर सुपरपावर अमेरिका की सैन्य साख और उसकी वैश्विक नेता वाली छवि के लिए एक विखंडन नाकामी साबित होती।


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