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दृश्यम 3 मूवी रिव्यू: विजय सालगांवकर की आखिरी बाजी में अजय देवगन-जयदीप अहलावत का जबरदस्त आमना-सामना



अजय देवगन का ठहराव, जयदीप अहलावत की दमदार मौजूदगी औरअभिषेक पाठक का कसा हुआ निर्देशन इसे एक मजबूत थ्रिलर बनाते हैं।

Posted On:Friday, October 2, 2026

निर्देशक - अभिषेक पाठक
कलाकार -अजय देवगन, तब्बू, श्रिया सरन, जयदीप अहलावत, रजत कपूर, इशिता दत्ता, प्रकाश राज, मृणाल जाधव, कमलेश सावंत, सौरभ शुक्ला, संवेदना सुवालका, अजीत सिंह, रामचन्द्र सिंह
रनटाइम - 150 मिनट

2 अक्टूबर... यह तारीख सुनते ही अब सिर्फ गांधी जयंती याद नहीं आती। हिंदी सिनेमा के दर्शकों के दिमाग में तुरंत विजय सालगांवकर, उसकापरिवार, सत्संग और पाव-भाजी वाली पूरी कहानी घूमने लगती है। 'दृश्यम' ने दर्शकों के दिमाग में अपनी जगह कुछ इस तरह बनाई कि फिल्म कीकहानी पॉप कल्चर का हिस्सा बन गई। 'दृश्यम 2' ने इस खेल को और मुश्किल बनाया और अब 'दृश्यम 3' विजय सालगांवकर की कहानी को आखिरी मुकाम तक पहुंचाती है। तीसरे पार्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि दर्शक अब विजय के दिमाग को पहचानते हैं और जानते हैं किवह हर चाल से कई कदम आगे सोचता है। इसके बावजूद फिल्म आपको बार-बार यह सोचने पर मजबूर करती है—इस बार विजय आखिर बचनेवाला कैसे है?

कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पिछली फिल्म ने इसे छोड़ा था। विजय सालगांवकर और उसका परिवार भले ही सामान्य जिंदगी की तरफ लौटनेकी कोशिश कर रहा हो, लेकिन अतीत उनका पीछा छोड़ने को तैयार नहीं है। मीरा देशमुख और महेश देशमुख अपने बेटे की मौत का सच और इंसाफपाने की कोशिश अब भी नहीं छोड़ पाए हैं। इस बार उनकी उम्मीद बनता है एसपी क्राइम ब्रांच राजवीर सिंह तोमर। राजवीर के हाथ एक ऐसा अहम सुराग लगता है, जो बंद समझे जा रहे मामले को फिर खोल सकता है। विजय के लिए खतरा इस बार ज्यादा बड़ा है, क्योंकि सामने ऐसा अधिकारी हैजो सिर्फ सबूत नहीं देख रहा, बल्कि विजय के सोचने के तरीके को भी समझने की कोशिश कर रहा है। इसके बाद कहानी जो रास्ता पकड़ती है, उसके बारे में कम जानना ही बेहतर है।

फिल्म की सबसे दिलचस्प बात यह है कि तीसरे पार्ट में लड़ाई सिर्फ पुलिस और विजय के बीच नहीं रहती। कानूनी मोर्चा भी उतना ही महत्वपूर्ण होजाता है। प्रकाश राज के इन्द्रजीत शेट्टी की एंट्री इसी हिस्से को मजबूत करती है। देशमुख परिवार के वकील के रूप में वह केस को एक नई दिशा देतेहैं। एक तरफ राजवीर सबूतों के जरिए विजय तक पहुंचना चाहता है, दूसरी तरफ अदालत में उसके खिलाफ शिकंजा कसने की कोशिश होती है।नतीजा यह है कि विजय को एक साथ कई मोर्चों पर अपनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। दर्शक भी लगातार यही अंदाजा लगाते रहते हैं कि क्या विजय नेइस स्थिति के लिए भी पहले से कोई रास्ता तैयार कर रखा है या इस बार उसका खेल सच में खत्म होने वाला है।

अजय देवगन एक बार फिर विजय सालगांवकर के रूप में बेहद सहज हैं। इस किरदार की ताकत कभी ऊंची आवाज या बड़े-बड़े संवाद नहीं रही,बल्कि उसकी खामोशी और ठहराव रहा है। अजय उसी खासियत को तीसरी फिल्म में भी बरकरार रखते हैं। कई दृश्यों में उनके चेहरे के भाव ही यहबताने के लिए काफी हैं कि विजय के दिमाग में कुछ चल रहा है, लेकिन क्या चल रहा है, फिल्म आसानी से इसका जवाब नहीं देती। परिवार कोबचाने के लिए किसी भी हद तक जाने वाला विजय अब ज्यादा अनुभवी जरूर है, मगर खतरा भी पहले से बड़ा है। अजय इस दबाव को बिनाओवरएक्ट किए स्क्रीन पर उतारते हैं।

इस बार उनके सामने जयदीप अहलावत हैं और यहीं फिल्म को नई ऊर्जा मिलती है। 'दृश्यम 2' में अक्षय खन्ना ने अपने किरदार के जरिए विजय को जबरदस्त चुनौती दी थी, इसलिए तीसरे पार्ट में उसी स्तर का नया प्रतिद्वंद्वी खड़ा करना आसान नहीं था। जयदीप किसी की नकल करने की कोशिशनहीं करते। राजवीर सिंह तोमर का अपना अंदाज, अपनी बॉडी लैंग्वेज और अपना आत्मविश्वास है। उनके संवाद धारदार हैं और अजय के साथ उनकेआमने-सामने वाले दृश्य फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। कुछ मौकों पर जयदीप अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से पूरा सीन अपने नाम कर लेते हैं।

बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूत आधार देते हैं। तब्बू की मीरा देशमुख के भीतर बेटे को खोने का दर्द और सच तक पहुंचने की जिद अब भीबरकरार है। रजत कपूर उनके साथ इस भावनात्मक संघर्ष को संतुलित करते हैं। श्रिया सरन और इशिता दत्ता सालगांवकर परिवार के डर और बेचैनीको विश्वसनीय बनाए रखती हैं। प्रकाश राज की मौजूदगी कोर्टरूम वाले हिस्सों को वजन देती है। वहीं कमलेश सावंत का लक्ष्मीकांत गायतोंडे तनावसे भरी कहानी में कुछ हल्के पल लेकर आता है। इतने सारे मजबूत किरदार होने के बावजूद फिल्म किसी एक को बेवजह आगे धकेलने की कोशिशनहीं करती।

निर्देशक अभिषेक पाठक की सबसे बड़ी जीत फिल्म का सस्पेंस बनाए रखना है। तीसरी फिल्म तक आते-आते दर्शक फ्रैंचाइजी के फॉर्मूले से परिचितहो चुके हैं। उन्हें मालूम है कि जो स्क्रीन पर दिखाई दे रहा है, उसके पीछे कुछ और भी हो सकता है। इसके बावजूद कहानी अपने पत्ते जल्दी नहींखोलती। कई सीक्वेंस बेहद कसे हुए हैं और संवाद फिल्म के तनाव को लगातार बढ़ाते हैं। फिल्म विजय को हर समय अजेय दिखाने के बजाय उसकेआसपास ऐसा जाल तैयार करती है, जिससे दर्शक भी कुछ समय के लिए सोचने लगते हैं कि शायद अब कोई रास्ता नहीं बचा।

'दृश्यम 3' की असली परीक्षा इसका क्लाइमैक्स था, क्योंकि पहली दोनों फिल्मों ने इस मामले में उम्मीदें काफी ऊंची कर दी थीं। तीसरा पार्ट उस विरासत को संभालते हुए कहानी को एक संतोषजनक मुकाम देने की कोशिश करता है। सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म सिर्फ पुराने ट्विस्ट दोहराने पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि विजय के सामने नई तरह की चुनौतियां खड़ी करती है। अगर आप 'दृश्यम' की दुनिया और विजय सालगांवकर के दिमागी खेल के फैन रहे हैं, तो यह अंतिम अध्याय आपको अंत तक व्यस्त रखता है। अजय देवगन का ठहराव, जयदीप अहलावत की दमदार मौजूदगी औरअभिषेक पाठक का कसा हुआ निर्देशन इसे एक मजबूत थ्रिलर बनाते हैं।


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