इजराइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव दुनिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चिंताओं में से एक बन चुका है। दोनों देशों के बीच सीधी सीमा नहीं है और न ही इनकी दुश्मनी किसी पुराने क्षेत्रीय युद्ध से शुरू हुई थी। इसके बावजूद आज हालात ऐसे हैं कि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव और परमाणु संघर्ष की आशंका तक जताई जा रही है।
कभी ईरान पश्चिम एशिया में इजराइल के सबसे करीबी देशों में शामिल था, लेकिन समय के साथ दोनों देशों के रिश्ते पूरी तरह बदल गए। इस बदलाव के पीछे राजनीति, धार्मिक विचारधारा, क्षेत्रीय प्रभाव की लड़ाई और अमेरिका की भूमिका जैसे कई कारण हैं।
दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर
1979 की ईरानी क्रांति से पहले ईरान और इजराइल के बीच संबंध काफी सामान्य थे। उस समय ईरान के शासक शाह मोहम्मद रजा पहलवी पश्चिमी देशों के करीबी माने जाते थे और इजराइल के साथ उनके कूटनीतिक तथा सुरक्षा संबंध थे।
लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में सत्ता बदल गई। नई सरकार ने अमेरिका और इजराइल को अपने प्रमुख विरोधियों के रूप में देखना शुरू किया। ईरान की नई विदेश नीति में फिलिस्तीन का मुद्दा भी एक बड़ा विषय बन गया और इजराइल के प्रति उसका रुख बेहद आक्रामक हो गया।
इसके बाद दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध तो नहीं हुआ, लेकिन लंबे समय से छद्म संघर्ष (Proxy Conflict) चलता रहा। ईरान ने क्षेत्र में हिज्बुल्लाह और अन्य संगठनों का समर्थन किया, जबकि इजराइल ने ईरान के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्यों बना विवाद?
ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस विवाद का सबसे बड़ा कारण बन गया। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों जैसे ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है। वहीं अमेरिका और इजराइल को आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में बढ़ सकता है।
इसी वजह से ईरान के परमाणु संयंत्र लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय निगरानी और विवाद का विषय रहे हैं। इजराइल का मानना है कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है तो उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
ईरान की ओर से आरोप लगाया जाता रहा है कि इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उसके परमाणु कार्यक्रम को नुकसान पहुंचाने के लिए कई गुप्त कार्रवाइयां कीं। इनमें वैज्ञानिकों की हत्या और परमाणु ढांचे को नुकसान पहुंचाने के आरोप शामिल हैं। इजराइल ने कई मामलों पर आधिकारिक रूप से टिप्पणी नहीं की है।
अमेरिका की भूमिका
ईरान और इजराइल के बीच तनाव में अमेरिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। अमेरिका लंबे समय से इजराइल का प्रमुख सहयोगी रहा है, जबकि ईरान और अमेरिका के संबंध 1979 की क्रांति के बाद से खराब रहे हैं।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका ने कई बार प्रतिबंध लगाए और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश भी की। 2015 में ईरान परमाणु समझौता हुआ था, जिसमें ईरान की परमाणु गतिविधियों पर सीमाएं लगाने के बदले प्रतिबंधों में राहत देने की व्यवस्था थी। हालांकि बाद में अमेरिका इस समझौते से बाहर हो गया, जिससे तनाव फिर बढ़ गया।
क्या परमाणु युद्ध का खतरा वास्तविक है?
विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु युद्ध की संभावना अभी भी बेहद गंभीर लेकिन जटिल मुद्दा है। दोनों पक्ष जानते हैं कि ऐसा संघर्ष पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
इजराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता और तकनीकी विकास का हिस्सा बताता है। यही विरोधाभास दोनों देशों के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह बना हुआ है।
फिलहाल ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि इसमें अमेरिका, खाड़ी देश और वैश्विक शक्तियां भी प्रभावित होती हैं। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में होने वाली हर सैन्य गतिविधि पर पूरी दुनिया की नजर रहती है।