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बंटवारा 1947 रिव्यू: कहानी दिल को छू सकती थी, लेकिन सनी देओल के भाषणों में कहीं खो गई



‘बंटवारा 1947’ उस दर्द को पूरी ताकत से महसूस नहीं करा पाती, जिसे दिखाने के लिए यह बनाई गई है।

Posted On:Friday, August 14, 2026

डायरेक्टर: राजकुमार संतोषी
कास्ट: सनी देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आज़मी, अली फज़ल, करण देओल, अभिमन्यु सिंह
अवधि – 145 मिनट

बंटवारे की कहानियां कभी पुरानी नहीं होतीं। 1947 में सिर्फ एक देश नहीं बंटा था, लाखों परिवारों की जिंदगी भी दो हिस्सों में टूट गई थी। इसीपृष्ठभूमि पर बनी ‘बंटवारा 1947’ एक हवेली के भीतर उस दौर की बड़ी तस्वीर दिखाने की कोशिश करती है। सिकंदर मिर्जा अपनी पत्नी हमीदा औरबेटे जावेद के साथ लाहौर पहुंचता है। रहने के लिए उसे एक हवेली मिलती है, लेकिन वहां दुर्गावती देवी पहले से मौजूद हैं और अपना घर छोड़ने केलिए तैयार नहीं। एक तरफ विस्थापित परिवार है, दूसरी तरफ अपनी मिट्टी से चिपकी एक बूढ़ी औरत, और ऊपर से उस घर पर नजर गड़ाए बैठीस्थानीय राजनीति। सेटअप दिलचस्प है और शुरुआत में फिल्म उम्मीद भी जगाती है।

लेकिन समस्या यह है कि फिल्म जितनी अच्छी कहानी बताना चाहती है, उतनी अच्छी तरह उसे कह नहीं पाती। शुरुआती आधे घंटे में माहौल बनता हैऔर लगता है कि यह एक ऐसा पार्टिशन ड्रामा हो सकता है जो बड़े सवालों के बीच छोटे-छोटे मानवीय रिश्तों को जगह देगा। फिर फिल्म धीरे-धीरेअपने ही संदेशों के बोझ तले दबने लगती है। हर भावना को समझाया जाता है, हर संघर्ष का मतलब बताया जाता है और हर मोड़ पर कोई न कोईकिरदार खड़ा होकर दर्शकों को बताता है कि इंसानियत क्यों जरूरी है। संदेश गलत नहीं हैं, लेकिन सिनेमा तब ज्यादा असर करता है जब दर्शक उन्हेंखुद महसूस करे।

सिकंदर मिर्जा के रूप में सनी देओल इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी हैं और कहीं-कहीं इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। ताकत इसलिए क्योंकिउनका व्यक्तित्व आज भी स्क्रीन पर वजन रखता है। वह चुप खड़े हों तब भी नजर उन पर जाती है और जब आवाज ऊंची करते हैं तो सीन अपने आपबड़ा लगने लगता है। लेकिन फिल्म को शायद उन पर इतना भरोसा था कि लगभग हर महत्वपूर्ण बात उनके मुंह से कहलवा दी गई है। धर्म पर चर्चा? सनी। नफरत पर सवाल? सनी। इंसानियत का संदेश? फिर सनी। क्लाइमैक्स से पहले जोश चाहिए? एक और लंबा सनी देओल संवाद। शुरुआत मेंतालियां बज सकती हैं, लेकिन बार-बार यही फॉर्मूला दोहराने पर असर कम होता जाता है।

यही वजह है कि कई संवाद सुनने में दमदार होने के बावजूद दृश्य का हिस्सा नहीं लगते, बल्कि अलग से लिखे गए भाषण महसूस होते हैं। सनी कीआवाज में अब भी वह पुराना असर है, लेकिन संवादों को सांस लेने की जगह नहीं मिलती। फिल्म अगर कुछ जगह चुप रहती, किरदारों को सिर्फदेखकर कहानी कहने देती, तो शायद वही बातें ज्यादा जोर से महसूस होतीं। यहां फिल्म दर्शक को भावुक करने की कोशिश इतनी खुलकर करती हैकि भावुक होने की गुंजाइश ही कम हो जाती है।

प्रीति जिंटा की वापसी जरूर आकर्षित करती है, लेकिन हमीदा के किरदार को उतना मजबूत नहीं लिखा गया है कि वह अपनी अलग पहचान बनासके। कई दृश्यों में वह कहानी का भावनात्मक हिस्सा बनने के बजाय सिकंदर की कहानी को आगे बढ़ाने वाली मौजूदगी लगती हैं। शबाना आज़मी केपास दुर्गावती देवी जैसा किरदार है, जिसमें दर्द, जिद और यादों का पूरा संसार हो सकता था। उनकी क्षमता को देखते हुए किरदार से और ज्यादाउम्मीद थी। अली फज़ल इस मामले में सबसे सहज नजर आते हैं। हबीब अनवर के रूप में उनका अभिनय बिना किसी अतिरिक्त शोर के काम करता हैऔर इसलिए उनके दृश्य ज्यादा स्वाभाविक लगते हैं। करण देओल को भी फिल्म में जगह मिलती है, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस अभी भी पूरी तरहखुलती हुई नहीं लगती।

फिल्म का खलनायक याकूब खान कहानी को निजी संघर्ष से निकालकर राजनीति और सत्ता की तरफ ले जाता है। अभिमन्यु सिंह ने किरदार में जरूरीआक्रामकता डालने की कोशिश की है, लेकिन उनका ट्रैक भी कुछ हद तक परिचित फिल्मी खांचे में चलता है। कहानी में हवेली सिर्फ एक मकान नहींहै—वह याद, पहचान और अधिकार का प्रतीक है। अगर फिल्म इसी विचार को केंद्र में रखती और कम किरदारों, कम भाषणों और ज्यादा रिश्तों केजरिए आगे बढ़ती, तो इसका असर कहीं ज्यादा गहरा हो सकता था।

फिल्म की तकनीकी दुनिया भी पूरी तरह साथ नहीं देती। लाहौर को दोबारा बनाने की कोशिश नजर आती है, लेकिन कई जगह सेट की कृत्रिमता पर्देसे बाहर झांकती रहती है। बंटवारे के दौरान जिस डर और अफरातफरी की कल्पना होती है, वह हर दृश्य में महसूस नहीं होती। ए. आर. रहमान कासंगीत फिल्म की गंभीरता के अनुरूप है, लेकिन कोई ऐसा गीत नहीं बन पाता जो कहानी के साथ मजबूत भावनात्मक रिश्ता बना सके। बैकग्राउंडम्यूजिक कुछ दृश्यों को सहारा जरूर देता है, मगर फिल्म को यादगार बनाने वाला तत्व नहीं बनता।

सबसे ज्यादा अफसोस इसलिए होता है क्योंकि ‘बंटवारा 1947’ में एक अच्छी फिल्म बनने की सामग्री मौजूद है। एक परिवार, एक उजड़ा हुआ शहर, अपनी जमीन से चिपकी एक औरत, नया घर तलाशते लोग और उस माहौल का फायदा उठाती राजनीति—यह सब मिलकर बहुत मजबूत ड्रामा बनासकता था। लेकिन फिल्म अपने किरदारों पर भरोसा करने के बजाय अपने संदेशों पर ज्यादा भरोसा करती है। नतीजा यह कि जो कहानी आंखों सेमहसूस होनी चाहिए थी, वह कई बार कानों से सुनाई देती है।

फिर भी फिल्म को पूरी तरह खारिज करना सही नहीं होगा। सनी देओल की स्क्रीन प्रेजेंस, अली फज़ल की सहजता और कहानी का मूल विचार कुछ ऐसे हिस्से हैं जो काम करते हैं। लेकिन ‘बंटवारा 1947’ उस दर्द को पूरी ताकत से महसूस नहीं करा पाती, जिसे दिखाने के लिए यह बनाई गई है। यह आपको बताती बहुत है, दिखाती कम है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी कमी है। सनी देओल के प्रशंसकों के लिए इसमें कुछ पुराने अंदाज की झलकियां जरूर हैं, लेकिन अगर आप एक गहरे, सूक्ष्म और भावनात्मक पार्टिशन ड्रामा की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो यह फिल्म उस उम्मीद तक पूरी तरह नहीं पहुंचती।


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