सरकारी दस्तावेजों से अलग है शादी की कानूनी वैधता
अदालत के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण था कि वोटर लिस्ट या दूसरे सरकारी दस्तावेजों में किसी महिला के नाम के साथ पति का नाम दर्ज होने को क्या विवाह का प्रमाण माना जा सकता है। कोर्ट ने इस तरह के रिकॉर्ड को अकेले निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार किया।
इसका मतलब है कि वोटर आईडी, राशन कार्ड या अन्य दस्तावेजों में पति का नाम दर्ज होना रिश्ते का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे अपने आप वैध हिंदू विवाह साबित नहीं होता।
विवाह की रस्में साबित करना जरूरी
कोर्ट ने हिंदू विवाह की वैधता के संदर्भ में आवश्यक रीति-रिवाजों के महत्व पर जोर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने सिंदूरदान और सात फेरे जैसी विवाह की रस्मों का उल्लेख किया। यानी जब शादी को कानूनी रूप से चुनौती दी जाती है, तो संबंधित पक्ष को यह दिखाना होगा कि विवाह कानून के मुताबिक आवश्यक समारोहों के साथ हुआ था।
क्या था पूरा मामला?
मामला मुजफ्फरपुर की दुर्गावती देवी से जुड़ा बताया गया है। उनके मुताबिक, उनकी पहली शादी 22 मई 1990 को सुरेश चौथरी से हुई थी और दोनों के दो बच्चे थे। 28 नवंबर 1997 को पति की मृत्यु के बाद दुर्गावती देवी ने दावा किया कि वर्ष 2002 में परिवार के दबाव में उनकी शादी मृत पति के छोटे भाई सचिता से करा दी गई।
बाद में उन्होंने ससुराल पक्ष पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने और घर से निकालने का आरोप लगाया। इसके बाद वह मायके में रहने लगीं। वर्ष 2004 में उन्होंने सीवान फैमिली कोर्ट का रुख किया। फैमिली कोर्ट ने 21 सितंबर 2005 को उन्हें 1,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया।
इस फैसले का मतलब
यह फैसला मुख्य रूप से एक अहम कानूनी अंतर स्पष्ट करता है—किसी सरकारी रिकॉर्ड में पति-पत्नी के रूप में नाम दर्ज होना और कानून की नजर में वैध विवाह साबित होना, दोनों अलग बातें हैं। विवाह की वैधता विवादित होने पर अदालत वास्तविक विवाह समारोह और लागू कानून के तहत उसकी वैधता के सबूत देख सकती है।