बनारस न्यूज डेस्क: नारद घाट वाराणसी के प्रमुख घाटों में से एक है, जिसे धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि देवर्षि नारद ने इसी स्थान पर तप और साधना की थी, जिसके कारण इस घाट का नाम नारद घाट पड़ा। यह स्थान आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है।
इस घाट से जुड़ी एक अनोखी लोक मान्यता भी प्रचलित है, जिसके अनुसार वैवाहिक दंपतियों को यहां एक साथ स्नान करने से बचना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा करने से दांपत्य जीवन में तनाव, विवाद और दूरी बढ़ सकती है। इसी कारण स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस घाट पर दंपति के रूप में स्नान करने से परहेज करते हैं।
इस मान्यता के पीछे यह तर्क भी दिया जाता है कि देवर्षि नारद आजीवन ब्रह्मचारी थे और यह स्थान उनकी साधना से जुड़ा है। ऐसे में विवाहिता जोड़ों के लिए यहां स्नान करना उनके वैवाहिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यही वजह है कि आसपास के लोग भी आमतौर पर अन्य घाटों पर ही गंगा स्नान करना पसंद करते हैं।
इतिहास के अनुसार, यह घाट मानसरोवर और राजा घाट के बीच स्थित है और इसका पुनर्निर्माण वर्ष 1788 में दक्षिण भारतीय संत सतीवेदानंद दत्तात्रेय द्वारा कराया गया था। घाट पर नारदेश्वर महादेव मंदिर भी स्थित है, जहां स्थापित शिवलिंग को देवर्षि नारद से जोड़ा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस घाट पर तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है। दक्षिण भारत से आने वाले श्रद्धालु यहां विशेष रूप से इन अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। सुबह और शाम के समय घाट पर अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिलती है।