भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाने का ऐलान किया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने टोक्यो में कहा कि भारत अगले दो महीनों के भीतर कुछ रेगुलेटरी नियमों में बदलाव करेगा। इसका मकसद सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट और ऑटोमोटिव कंपोनेंट बनाने वाली विदेशी कंपनियों की नियामकीय चिंताओं को दूर करना और देश में निवेश की प्रक्रिया को आसान बनाना है।
सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है, जब भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और ऑटो-कंपोनेंट सेक्टर में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। सरकार चाहती है कि कंपनियां भारत में सिर्फ असेंबली या सीमित उत्पादन के बजाय पूरी मैन्युफैक्चरिंग चेन विकसित करें।
दो महीने में बदले जाएंगे नियम
पीयूष गोयल ने टोक्यो में कहा कि सरकार अगले 60 दिनों के भीतर जरूरी नियमों में बदलाव करेगी। खास तौर पर भारतीय मानक ब्यूरो यानी BIS से जुड़े नियमों और अप्रूवल प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
मंत्री के मुताबिक, भारत में सेमीकंडक्टर और ऑटोमोटिव पार्ट्स मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने की इच्छा रखने वाली दो बड़ी वैश्विक कंपनियों के साथ उनकी बैठक हुई है। इन कंपनियों ने भारत में कारोबार करने के दौरान आने वाली कुछ नियामकीय दिक्कतों को सामने रखा था। सरकार ने इन चिंताओं को दूर करने का भरोसा दिया है।
इसका उद्देश्य कंपनियों के लिए अप्रूवल प्रक्रिया को तेज करना और कारोबार शुरू करने में लगने वाले समय को कम करना है।
BIS नियमों को आसान बनाने की तैयारी
भारत में उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए BIS के मानक महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, विदेशी कंपनियों की ओर से कई बार यह शिकायत की जाती रही है कि कुछ मानकों और प्रमाणन प्रक्रियाओं के कारण भारत में मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने में अतिरिक्त समय और लागत लगती है।
सरकार अब ऐसे नियमों की समीक्षा करने की तैयारी में है, जिससे गुणवत्ता मानकों से समझौता किए बिना अप्रूवल प्रक्रिया को अधिक आसान और तेज बनाया जा सके।
इससे सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट, ऑटो कंपोनेंट और दूसरे हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश करने वाली कंपनियों को फायदा मिलने की उम्मीद है।
‘प्लस वन’ से आगे बढ़ना चाहता है भारत
पीयूष गोयल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत खुद को केवल चीन के विकल्प के तौर पर यानी ‘प्लस वन’ मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन के रूप में पेश नहीं करना चाहता। भारत की कोशिश एक ऐसे मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को तैयार करने की है, जहां वैश्विक कंपनियां लंबे समय के लिए उत्पादन और सप्लाई चेन स्थापित कर सकें।
सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्र में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि चिप निर्माण के लिए केवल एक फैक्ट्री काफी नहीं होती। इसके लिए डिजाइन, उपकरण, सामग्री, पैकेजिंग, टेस्टिंग और सप्लाई चेन से जुड़े कई स्तरों पर मजबूत इकोसिस्टम की जरूरत होती है।
सेमीकॉन 2.0 मिशन पर सरकार का फोकस
भारत ने सेमीकंडक्टर सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए ‘सेमीकॉन 2.0’ मिशन को मंजूरी दी है। इस मिशन के तहत बड़े पैमाने पर निवेश और देश में चिप मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार अगले डेढ़ साल में करीब 50 अरब डॉलर के निवेश लक्ष्य पर भी जोर दे रही है। ऐसे में रेगुलेटरी बाधाओं को कम करना इस पूरे मिशन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
निवेश और रोजगार के बढ़ेंगे अवसर
अगर सरकार तय समयसीमा में नियमों को आसान करती है और कंपनियों के लिए अप्रूवल प्रक्रिया तेज होती है, तो भारत में सेमीकंडक्टर और ऑटो-कंपोनेंट सेक्टर में नए निवेश आने की संभावना बढ़ सकती है।
इससे देश में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही घरेलू कंपनियों को वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ने का मौका मिलेगा।
सरकार का 60 दिनों का यह एक्शन प्लान कितना सफल होता है, यह आने वाले समय में साफ होगा। लेकिन अगर नियामकीय सुधार वास्तव में जमीन पर लागू होते हैं, तो भारत के लिए ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में यह एक अहम कदम साबित हो सकता है।