हर साल मानसून की दस्तक के साथ ही प्रकृति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। बारिश के कारण जहां एक तरफ तपती गर्मी से राहत मिलती है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में सांपों के निकलने और इंसानों को काटने (Snakebite) की घटनाएं अचानक बहुत तेजी से बढ़ जाती हैं। आम तौर पर लोग इसे केवल बारिश का एक स्वाभाविक असर मानते हैं, लेकिन भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की मदद से किए गए एक हालिया और व्यापक अध्ययन ने इस विषय में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं। नए आंकड़े बताते हैं कि सांप हर किसी को बराबर निशाना नहीं बनाते, बल्कि समाज के कुछ खास वर्ग इसके सबसे बड़े शिकार होते हैं।
इस शोध के अनुसार, सर्पदंश का सबसे ज्यादा खतरा पुरुषों, खेतों में काम करने वाले किसानों, मजदूरों, ग्रामीण आबादी और आर्थिक रूप से कमजोर यानी गरीब परिवारों पर मंडराता है। इस विश्लेषण से यह साफ हो गया है कि सांप का डंक सिर्फ एक अचानक होने वाली मेडिकल इमरजेंसी नहीं है, बल्कि यह देश की गरीबी, आजीविका के साधनों और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की लाचारी से जुड़ा एक बहुत बड़ा सामाजिक मुद्दा भी है।
क्यों पुरुष और किसान ही बनते हैं इसका सबसे ज्यादा शिकार?
आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह बात सामने आई है कि सांप के काटने के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में कहीं अधिक है। इसका मुख्य कारण हमारी सामाजिक और आर्थिक संरचना है। ग्रामीण भारत में खेती-किसानी, पशुपालन, निर्माण कार्य, जंगलों से लकड़ी या चारा लाना और विशेषकर रात के समय खेतों की सिंचाई करने जैसे जोखिम भरे कामों में पुरुषों की भागीदारी सबसे ज्यादा होती है। रोजी-रोटी कमाने के लिए खेतों और खुले जंगलों में लंबे समय तक रहने के कारण वे सीधे तौर पर जहरीले सांपों के संपर्क में आ जाते हैं।
गरीबी से जुड़ी उपेक्षित बीमारी (Neglected Disease of Poverty)
विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के बाद सांप के काटने को केवल एक स्वास्थ्य समस्या मानने से इनकार किया है। उन्होंने इसे 'गरीबी से जुड़ी उपेक्षित बीमारी' का दर्जा दिया है। इसके पीछे कई ठोस और जमीनी कारण हैं:
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कच्चे मकान और फर्श पर सोना: गरीब परिवारों के पास अक्सर पक्के मकानों की कमी होती है। मिट्टी के घरों या झोपड़ियों में सांप आसानी से घुस जाते हैं। साथ ही, भीषण गर्मी और संसाधनों की कमी के कारण फर्श पर सोने की मजबूरी खतरे को कई गुना बढ़ा देती है।
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इलाज में देरी और जागरूकता का अभाव: अध्ययन में यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि सर्पदंश से मरने वाले अधिकांश लोग बेहद गरीब पृष्ठभूमि से होते हैं। इनमें से कई लोगों की मौत अस्पताल पहुंचने से पहले ही, रास्ते में या समय पर सही इलाज न मिलने के कारण हो जाती है। ग्रामीण इलाकों में आज भी अंधविश्वास के कारण लोग पहले झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं, जिससे कीमती समय बर्बाद हो जाता है।
इसके अतिरिक्त, गांवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) की दूरी और वहां एंटी-स्नेक वेनम (Anti-Snake Venom) की अनुपलब्धता या डॉक्टरों की कमी के कारण रास्ते में ही दम तोड़ने वालों का आंकड़ा बेहद डराने वाला है। इस रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि भारत को सर्पदंश से होने वाली मौतों को रोकना है, तो स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ ग्रामीण गरीबों के जीवन स्तर और उनकी सुरक्षा में भी सुधार करना होगा।