सुप्रीम कोर्ट ने देश के वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बुजुर्ग माता-पिता अपने उन बच्चों या बहू को अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं जो उनका रखरखाव करने में विफल रहते हैं या उन्हें प्रताड़ित करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उम्र बढ़ने का अर्थ असुरक्षा या अपमान सहना नहीं है; संविधान के तहत हर नागरिक को जीवन भर गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
इस फैसले के साथ ही उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस पुराने आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसमें एक ट्रिब्यूनल कोर्ट द्वारा बेटे और बहू को बेदखल करने के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को बरकरार रखते हुए कहा कि 'वरिष्ठ नागरिक रखरखाव और कल्याण अधिनियम' के तहत ट्रिब्यूनल के पास बुजुर्गों की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए परिजनों को बेदखल करने का पूरा कानूनी अधिकार है। अदालत का यह आदेश देश भर के उन लाखों वरिष्ठ नागरिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है जो अपनी ही संपत्ति में उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना कर रहे थे।