बनारस न्यूज डेस्क: सारनाथ को भारत का 45वां यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किए जाने की प्रक्रिया में पिछले साल अक्टूबर में यूनेस्को की विशेषज्ञ टीम का दौरा बेहद अहम साबित हुआ। निरीक्षण के दौरान टीम ने धमेख स्तूप का बारीकी से अध्ययन किया और इससे जुड़ी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परंपराओं पर कई सवाल पूछे। इनमें एक सवाल ऐसा था, जिसने विशेषज्ञों और प्रशासन दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
टीम ने जानना चाहा कि स्तूप से जुड़ी ऐसी कौन-सी परंपरा है, जो इसके निर्माण काल से आज तक लगातार चली आ रही है। इसके जवाब के लिए बीएचयू के कला-इतिहास विभाग से संपर्क किया गया। वहां से बताया गया कि धमेख स्तूप पर उकेरी गई पुष्प और बेल-बूटों की नक्काशी केवल सजावट नहीं, बल्कि काशी की प्राचीन देवदुष्य वस्त्र परंपरा का प्रतीक है।
बीएचयू की कला-इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. ज्योति रोहिल्ला राणा के अनुसार, मौर्य सम्राट अशोक के समय जब स्तूप का निर्माण हुआ था, तब बौद्ध अनुयायी अनुष्ठानों के दौरान उस पर विशेष रेशमी वस्त्र चढ़ाते थे। समय के साथ कपड़े नष्ट हो जाते थे, इसलिए उनकी डिजाइन को पत्थरों पर उकेर दिया गया, ताकि यह परंपरा हमेशा के लिए सुरक्षित रहे। यही परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में निभाई जाती है।
प्रो. राणा ने बताया कि धमेख स्तूप के निचले हिस्से पर बनी पुष्प, बेल-बूटों और ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी काशी की प्राचीन वस्त्र कला को दर्शाती है। महापरिनिब्बान सूत्र के अनुसार, भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद अंतिम संस्कार के लिए काशी से विशेष वस्त्र भेजे गए थे, जिनमें उनके पार्थिव शरीर को लपेटा गया था। इससे स्पष्ट होता है कि काशी प्राचीन काल से उत्कृष्ट वस्त्र निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र रही है।
देवदुष्य संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ अत्यंत उत्कृष्ट या दिव्य वस्त्र होता है। प्राचीन भारतीय और जैन ग्रंथों में इसका उल्लेख बहुमूल्य, महीन और अलंकृत कपड़े के रूप में मिलता है। कई इतिहासकार इसे रेशमी वस्त्र से भी जोड़ते हैं।
पुरातत्वविद डॉ. बी.आर. मणि ने भी अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि धमेख स्तूप के आधार पर बनी अलंकृत पट्टियों की नक्काशी उस वस्त्र-आवरण की डिजाइन जैसी प्रतीत होती है, जिसे प्राचीन काल में स्तूप पर चढ़ाया जाता था। इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता ने यूनेस्को की मूल्यांकन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना भारत की समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। उन्होंने कहा कि भारत ने सदियों से ज्ञान, करुणा और सद्भाव का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया है।