भारत में इन दिनों करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रही है। आलम यह है कि देश में जितनी तेजी से नए अमीर पैदा हो रहे हैं, उनकी संपत्ति को संभालने और सही जगह निवेश करवाने वाले अनुभवी ‘वेल्थ मैनेजरों’ की भारी कमी पैदा हो गई है। पिछले कुछ सालों में 3 करोड़ डॉलर यानी करीब 250 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति वाले भारतीयों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया है। इसके मुकाबले, देश में ऐसे रईसों का पोर्टफोलियो संभालने वाले योग्य रिलेशनशिप मैनेजरों की संख्या ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। पैसों की इस अचानक आई बाढ़ ने वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियों के सामने एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
अमीरों की सुनामी और सलाहकारों का गंभीर संकट
नाइट फ्रैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत में अल्ट्रा-रिच (अति-अमीर) लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। साल 2021 में देश में 3 करोड़ डॉलर से अधिक की नेटवर्थ वाले लोगों की संख्या 12,161 थी, जो अब बढ़कर लगभग 19,877 तक पहुंच गई है। अनुमान लगाया जा रहा है कि साल 2031 तक यह आंकड़ा 25,000 के आंकड़े को पार कर जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि देश के कुल अल्ट्रा-रिच लोगों का 35 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले मुंबई शहर में रहता है। भारत में अरबपतियों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि, असली चुनौती यह है कि इन रईसों को पेशेवर वित्तीय सलाह देने वाले विशेषज्ञ बाजार में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। जानकारों का मानना है कि यदि साल 2028 तक रिलेशनशिप मैनेजरों की संख्या बढ़कर 2,800 तक पहुंच भी जाती है, तब भी वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर पर बना यह दबाव कम नहीं होने वाला है।
वेल्थ मैनेजरों की बल्ले-बल्ले, मिल रहा है भारी इंक्रीमेंट
बाजार में अनुभवी सलाहकारों और टैलेंट की इस भारी किल्लत का सीधा फायदा वर्तमान में कार्यरत वेल्थ मैनेजरों को मिल रहा है। मोतीलाल ओसवाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस सेक्टर में कुशल प्रोफेशनल्स की भारी मांग और सीमित आपूर्ति के चलते बैंक और प्राइवेट वेल्थ फर्में एक-दूसरे के कर्मचारियों को ऊंचे पैकेज पर हायर कर रही हैं। स्थिति यह है कि योग्य रिलेशनशिप मैनेजरों को उनकी मौजूदा सैलरी पर 40 प्रतिशत तक का बंपर इंक्रीमेंट और शानदार इंसेंटिव्स मिल रहे हैं।
आगे की चुनौतियाँ और भविष्य
इस सेक्टर में आ रही इस तेजी के साथ कई संरचनात्मक चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। संपत्ति प्रबंधन सिर्फ पैसों का निवेश करना नहीं है, बल्कि इसमें टैक्स प्लानिंग, उत्तराधिकार योजना (Succession Planning), और ग्लोबल मार्केट्स की समझ शामिल होती है। जब तक देश में वित्तीय शिक्षा और ट्रेनिंग संस्थानों के जरिए इस गैप को तेजी से नहीं भरा जाता, तब तक वेल्थ मैनेजमेंट कंपनियों के बीच टैलेंट को लेकर यह खींचतान जारी रहेगी। आने वाले समय में जो फर्में अपने कर्मचारियों को रोकने और नए टैलेंट को तराशने में सफल होंगी, वही इस बाजार में लीडर बनेंगी।