भारत के सबसे बड़े शेयर बाजार, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) ने नियामक सेबी के समक्ष दाखिल अपने आईपीओ दस्तावेजों में भविष्य के वित्तीय प्रदर्शन और संचालन को लेकर कई गंभीर परिचालन जोखिमों को रेखांकित किया है। एक्सचेंज ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि उसका वर्तमान राजस्व मॉडल संतुलित नहीं है और यह मुख्य रूप से डेरिवेटिव्स बाजार पर निर्भर है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, एनएसई के कुल परिचालन राजस्व का लगभग 78.65 प्रतिशत हिस्सा अकेले लेनदेन शुल्क (ट्रांजैक्शन फीस) से प्राप्त हुआ है, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी ऑप्शंस ट्रेडिंग (विकल्प कारोबार) की है, जिसका योगदान 60.22 प्रतिशत दर्ज किया गया है। एक्सचेंज ने आगाह किया है कि सेबी द्वारा हाल ही में इक्विटी वायदा-विकल्प ढांचे को मजबूत करने के लिए उठाए गए कड़े नियामकीय कदमों के कारण कैश और डेरिवेटिव दोनों ही खंडों में ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट देखी गई है, जिसने चालू वित्त वर्ष में उसकी मुख्य आय को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।
राजस्व असंतुलन के अलावा, पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक हो चुके ट्रेडिंग इकोसिस्टम में तकनीकी विफलता और अभूतपूर्व साइबर सुरक्षा उल्लंघनों को एनएसई ने अपना दूसरा सबसे बड़ा परिचालन खतरा माना है। दस्तावेजों में खुलासा किया गया है कि मई 2025 में एनएसई की मुख्य वेबसाइट पर एक विनाशकारी डिस्ट्रीब्यूटेड डिनायल ऑफ सर्विस (DDoS) हमला हुआ था, जिसके तहत महज 11 मिनट के भीतर रिकॉर्ड 39.5 करोड़ हिट्स जनरेट कर पूरी प्रणाली को चोक करने का प्रयास किया गया। इसके पूर्व फरवरी 2021 में आई भीषण तकनीकी गड़बड़ी के कारण जोखिम प्रबंधन और समाशोधन प्रणालियां पूरी तरह ठप हो गई थीं, जिससे पांच घंटे से अधिक समय तक बाजार बंद रखना पड़ा था। इसके अलावा को-लोकेशन, डार्क फाइबर और हाल ही में अक्टूबर 2024 में ट्रेडिंग एक्सेस पॉइंट (TAP) संरचना के विवादों के निपटारे के लिए एक्सचेंज को 643 करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम विधिक भुगतान करना पड़ा है, जो उसकी साख और वित्तीय तरलता को प्रभावित करता है।
एनएसई ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग (ML) के बढ़ते उपयोग को भी एक नए और अदृश्य जोखिम क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। हालांकि एक्सचेंज निगरानी और ग्राहक सेवाओं में एआई टूल्स का उपयोग बढ़ा रहा है, लेकिन उसने चेतावनी दी है कि पक्षपाती या त्रुटिपूर्ण डेटा के कारण एआई एल्गोरिदम गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जिससे बाजार में अचानक अत्यधिक अस्थिरता आ सकती है। आईपीओ ड्राफ्ट के अनुसार, एआई-संचालित अत्याधुनिक साइबर हमले, डीपफेक तकनीक के माध्यम से पहचान की चोरी, थर्ड-पार्टी एआई उपकरणों से संवेदनशील वित्तीय डेटा का लीक होना और एआई-जनरेटेड कोडिंग में मौजूद सुरक्षा कमियां एक्सचेंज के बुनियादी ढांचे के लिए एक विलेख चुनौती बन चुकी हैं। नियमों में संभावित कड़ाई और तकनीकी ऑडिट की बढ़ती विधिक आवश्यकताओं के कारण भविष्य में अनुपालन लागत (कॉम्प्लायंस कॉस्ट) का बढ़ना भी तय माना जा रहा है।