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FCNR(B) स्कीम: एनआरआई जमा बढ़ी, लेकिन बैंकों के मुनाफे पर बढ़ सकता है दबाव

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Posted On:Wednesday, July 29, 2026

भारत में विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार की Foreign Currency Non-Resident (Bank) [FCNR(B)] डिपॉजिट स्कीम को एनआरआई का अच्छा समर्थन मिल रहा है। बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय इस योजना में निवेश कर रहे हैं, जिससे देश में डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं का प्रवाह बढ़ रहा है। हालांकि, इस सकारात्मक रुझान के बीच बैंकिंग सेक्टर के लिए एक नई चुनौती भी सामने आई है।

बैंकिंग विश्लेषकों के अनुसार, FCNR(B) डिपॉजिट्स आकर्षित करने के लिए बैंक ग्राहकों को आकर्षक ब्याज दरों और अधिक लेवरेज की सुविधा दे रहे हैं। लेकिन विदेशों में ब्याज दरें अपेक्षाकृत कम होने और लेंडिंग स्प्रेड सीमित रहने के कारण बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सबसे अधिक असर उन बैंकों पर पड़ने की संभावना है जिनकी फंडिंग कॉस्ट पहले से कम है, जैसे ICICI Bank, HDFC Bank और Kotak Mahindra Bank

100 डॉलर जमा पर 800 डॉलर तक का लोन

FCNR(B) स्कीम के तहत कुछ बैंक ग्राहकों को जमा राशि के आधार पर अधिक लेवरेज उपलब्ध करा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, 100 डॉलर के डिपॉजिट पर 800 डॉलर तक का लोन देने जैसी सुविधाएं चर्चा में हैं। इससे एनआरआई निवेशकों को अतिरिक्त वित्तीय लाभ मिलता है, लेकिन बैंकों के लिए यह फंडिंग लागत और मार्जिन के लिहाज से चुनौती बन सकता है।

ICICI बैंक ने क्या कहा?

ICICI बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संदीप बत्रा ने पोस्ट-अर्निंग्स मीडिया बातचीत में स्वीकार किया कि FCNR(B) स्कीम के तहत जुटाए गए नए डिपॉजिट्स की लागत सामान्य डिपॉजिट्स की तुलना में अधिक हो सकती है। उन्होंने कहा कि इससे बैंक के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) में मामूली कमी आ सकती है।

हालांकि, उनका कहना है कि बैंक लाभप्रदता और जोखिम के बीच संतुलन बनाए रखते हुए उपलब्ध सभी विकल्पों का बेहतर उपयोग करेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि घरेलू ब्याज दरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है, तो बैंक का मार्जिन मौजूदा दायरे में बना रह सकता है।

बैंकों के सामने क्या है चुनौती?

विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकों को एक ओर एनआरआई ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी ब्याज दरें देनी होंगी, वहीं दूसरी ओर विदेशी बाजारों में कम ब्याज दरों के बीच लाभदायक लेंडिंग भी सुनिश्चित करनी होगी। यदि डिपॉजिट की लागत लगातार बढ़ती रही और लोन से मिलने वाला मार्जिन सीमित रहा, तो आने वाले समय में बैंकों की कमाई पर दबाव बढ़ सकता है।


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