मिडिल क्लास निवेशकों के लिए प्रॉपर्टी खरीदना लंबे समय से एक पसंदीदा निवेश विकल्प रहा है। खासकर किराये से नियमित कमाई के लिए छोटा फ्लैट खरीदने का सपना बहुत से लोग देखते हैं। लेकिन मेट्रो शहरों में लगातार बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों ने इस सपने को मुश्किल बना दिया है। ₹20 से ₹30 लाख के बजट में अच्छी लोकेशन पर फ्लैट खरीदना, खासकर स्टाम्प ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और ब्रोकरेज जैसे अतिरिक्त खर्चों को जोड़ने के बाद, काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
ऐसे में Real Estate Investment Trust यानी REITs एक वैकल्पिक रास्ता देते हैं। इसके जरिए निवेशक बिना करोड़ों रुपये की कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदे रियल एस्टेट से जुड़ी कमाई में हिस्सा ले सकता है। अब सवाल है कि सीमित बजट वाले निवेशक के लिए खुद का फ्लैट खरीदना बेहतर है या REITs में निवेश करना?
म्यूचुअल फंड की तरह काम करते हैं REITs
REITs की कार्यप्रणाली कुछ हद तक म्यूचुअल फंड जैसी होती है। कई निवेशकों से पैसा जुटाकर REITs को आमतौर पर बड़े कमर्शियल रियल एस्टेट एसेट्स में लगाया जाता है। इनमें ऑफिस कॉम्प्लेक्स, आईटी पार्क, शॉपिंग सेंटर और अन्य आय पैदा करने वाली संपत्तियां शामिल हो सकती हैं।
इसका फायदा यह है कि निवेशक को खुद पूरी प्रॉपर्टी खरीदने और उसका रखरखाव करने की जरूरत नहीं होती। छोटी रकम के जरिए भी वह बड़े कमर्शियल रियल एस्टेट पोर्टफोलियो में एक्सपोजर हासिल कर सकता है।
₹20-30 लाख के बजट में फ्लैट की चुनौती
अगर किसी निवेशक के पास ₹20-30 लाख हैं, तो बड़े शहरों में अच्छी लोकेशन पर किराये के लिए उपयुक्त फ्लैट ढूंढना आसान नहीं है। कई मामलों में फ्लैट की कीमत के अलावा स्टाम्प ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन, ब्रोकरेज और अन्य लेनदेन खर्च भी जुड़ जाते हैं।
इसके अलावा फ्लैट खरीदने के बाद मेंटेनेंस, मरम्मत, प्रॉपर्टी टैक्स और किरायेदार से जुड़ी समस्याओं का जिम्मा भी मालिक का होता है। अगर कुछ समय तक फ्लैट खाली रहता है तो किराये की आय भी रुक सकती है।
REITs में इन व्यक्तिगत संपत्ति प्रबंधन की परेशानियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि REITs में जोखिम नहीं होता।
REITs से कैसे मिल सकती है कमाई?
REITs से निवेशकों को आम तौर पर दो तरह से फायदा मिल सकता है। पहला, संपत्तियों से होने वाली आय के आधार पर नियमित वितरण और दूसरा, बाजार में REIT की यूनिट की कीमत बढ़ने पर पूंजीगत लाभ।
भारत में REITs को SEBI के नियमों के तहत संचालित किया जाता है। मौजूदा ढांचे में REITs को अपनी वितरण योग्य नकदी प्रवाह का बड़ा हिस्सा निवेशकों तक पहुंचाना होता है। इसलिए कई निवेशक इन्हें नियमित आय के संभावित स्रोत के रूप में देखते हैं।
हालांकि, वितरण की राशि और यूनिट की बाजार कीमत तय नहीं होती। कमर्शियल प्रॉपर्टी की मांग, किराये की दर, ब्याज दरें, आर्थिक स्थिति और बाजार के उतार-चढ़ाव का असर REIT पर पड़ सकता है।
फ्लैट या REITs, किसे चुनें?
अगर आपका उद्देश्य खुद रहने के लिए घर खरीदना है, तो फ्लैट और REITs की तुलना सीधे तौर पर करना सही नहीं होगा। लेकिन अगर मकसद मुख्य रूप से निवेश और किराये जैसी आय हासिल करना है, तो REITs कम पूंजी में कमर्शियल रियल एस्टेट में एक्सपोजर का विकल्प दे सकते हैं।
वहीं, खुद का फ्लैट आपको एक फिजिकल एसेट देता है, लेकिन इसमें बड़ी शुरुआती पूंजी, कम लिक्विडिटी और रखरखाव की जिम्मेदारी होती है।
इसलिए ₹20-30 लाख के निवेशक को फैसला लेने से पहले अपनी आय, जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश अवधि और नियमित कैश फ्लो की जरूरत को देखना चाहिए। REITs में निवेश करने से पहले संबंधित REIT की संपत्तियों, किरायेदारों, कर्ज, वितरण इतिहास और वैल्यूएशन की जांच करना भी जरूरी है।