सहिया के सर्टिफिकेशन को लेकर चल रहा विवाद अब सिर्फ एक फिल्म को सर्टिफिकेट मिलने या न मिलने तक सीमित नहीं रह गया है। फिल्म केडायरेक्टर और प्रोड्यूसर संजय शर्मा ने CBFC की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ऐसी फिल्मों का उदाहरण दिया, जिनमें पर्दे पर जमकर हिंसादिखाई गई, लेकिन उन फिल्मों को लेकर वैसी आपत्ति नहीं उठाई गई जैसी उनकी फिल्म को लेकर उठाई जा रही है। उन्होंने बिना फिल्म का नामलिए कहा, “मैं फिल्म का नाम नहीं लूंगा, लेकिन हाल ही में एक फिल्म आई थी जिसमें शुरू से आखिर तक सिर्फ़ हिंसा थी — सिर काटे जा रहे थेऔर फुटबॉल की तरह इधर-उधर लात मारी जा रही थी — फिर भी सेंसर बोर्ड ने उसे हिंसा नहीं माना।”
संजय शर्मा का सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर सिनेमा में युद्ध, आतंकवाद, पुलिस एनकाउंटर और हिंसा को कहानी का हिस्सा बनाकर दिखाया जासकता है, तो आदिवासी जीवन और संघर्ष की कहानी दिखाने वाली सहिया पर नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप क्यों? शर्मा ने कहा, “क्याफिल्म में सिर्फ जंगल का दिखना नक्सलवाद के बराबर है? क्या आदिवासी कम्युनिटी का दिखना नक्सलवाद का मतलब है?” उनके मुताबिक यहसोच ही समस्या है कि जंगल में शूट हुई या आदिवासी किरदारों वाली हर कहानी को नक्सलवाद से जोड़कर देखा जाए। उन्होंने सवाल किया, “यहकैसी सोच है — यह मान लेना कि जंगल में सेट एक कहानी नक्सलवादियों के बारे में ही होगी?”
35 साल तक पत्रकारिता करने के बाद बतौर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म बना रहे शर्मा ने बताया कि उन्होंने सहिया को सिर्फ एकस्टूडियो सेट पर खड़ा करने के बजाय झारखंड के नेतरहाट के वास्तविक माहौल में शूट किया। वह फिल्म में उस जमीन, जंगल और समुदाय कीवास्तविकता लाना चाहते थे जिसकी कहानी कह रहे थे। शर्मा ने कहा, “मैंने सहिया नाम की एक खूबसूरत फिल्म बनाने में अपना दिल लगा दिया।” लेकिन अब उन्हें लगता है कि जिस वास्तविकता को पर्दे पर लाने की कोशिश की गई, वही सर्टिफिकेशन के दौरान सवालों के घेरे में आ गई।
फिल्म में शांतनु माहेश्वरी, रिंकू राजगुरु और नीरज काबी अहम भूमिकाओं में हैं। कहानी पुलिस और नक्सलियों के बीच संघर्ष के बीच फंसे एकआदिवासी युवक और युवती की है। शर्मा के मुताबिक फिल्म का उद्देश्य नक्सल आंदोलन का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि उस हिंसा के बीच आमलोगों की जिंदगी को दिखाना है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “आपने पूरी फिल्म देखी है; इसमें बिल्कुल भी नक्सलवाद नहीं है।” आगे उन्होंने फिल्मकी कहानी समझाते हुए कहा, “यह एक आदिवासी कम्युनिटी के एक युवक और युवती की लव स्टोरी है जो नक्सलवादियों और पुलिस दोनों से लड़तेहुए अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं — यह दिखाती है कि कैसे एक पत्नी 24 घंटे के अंदर अपने पति को जंगल से भागने में मदद करती है।”
शर्मा ने यह भी सवाल उठाया कि अगर CBFC को फिल्म के किसी हिस्से पर आपत्ति है, तो उसे साफ तौर पर बताया क्यों नहीं जाता। उनका कहनाहै कि सिर्फ यह कह देना कि फिल्म हिंसा या नक्सलवाद को बढ़ावा देती है, पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा, “ज़रूर आप खास पलों को बताएंगे — जैसे, ‘3 मिनट 4 सेकंड से 5 मिनट 6 सेकंड तक, नक्सलवाद को बढ़ावा देने वाला एक डायलॉग है,’ या ‘8 मिनट से 11 मिनट तक, नक्सलवाद से जुड़ीहिंसा है।’” उनके मुताबिक अगर आपत्ति किसी खास सीन, डायलॉग या हिस्से पर है, तो फिल्ममेकर को वह बताना चाहिए। “आप मुझे बता सकते थेकि ‘हमें इस खास हिस्से या उस हिस्से पर आपत्ति है,’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।”
इसी संदर्भ में शर्मा ने हालिया एक्शन और युद्ध आधारित फिल्मों की ओर इशारा करते हुए कहा कि किसी चीज को पर्दे पर दिखाना और उसकासमर्थन करना दो अलग बातें हैं। उन्होंने बिना नाम लिए जिस फिल्म का जिक्र किया, उसके उदाहरण के जरिए यही सवाल उठाया कि अगर हिंसाकहानी का हिस्सा होने के बावजूद उसे अपने आप हिंसा का समर्थन नहीं माना जाता, तो सहिया के साथ अलग पैमाना क्यों? उन्होंने कहा, “उसलॉजिक से, कश्मीर की घटनाओं पर बनी हर फिल्म को आतंकवाद का समर्थन करने वाला बताया जाना चाहिए। युद्ध पर बनी हर फिल्म कोदेश-विरोधी बताया जाना चाहिए।”
शर्मा ने फिल्म की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में हुई देरी को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उनके मुताबिक उन्होंने 30 अप्रैल को प्रायोरिटी स्क्रीनिंगके लिए आवेदन किया था और इसके लिए सामान्य फीस से तीन गुना ज्यादा रकम भी जमा की थी। उनका दावा है कि नियमों के मुताबिक फिल्म कोपांच दिनों के भीतर देखा जाना चाहिए था, लेकिन स्क्रीनिंग होने में 51 दिन लग गए। उन्होंने कहा, “मैंने नियम पढ़े थे: प्रायोरिटी स्कीम के तहत, अगरआप आवेदन करते हैं और सामान्य फीस से तीन गुना ज़्यादा फीस देते हैं, तो सेंसर बोर्ड को आपकी फिल्म पांच दिनों के भीतर देख लेनी चाहिए। फिरभी, फिल्म को देखे जाने में 51 दिन लग गए।”
छोटे बजट की फिल्म के लिए यह देरी सिर्फ कैलेंडर की तारीखों का आगे-पीछे होना नहीं है। शर्मा के मुताबिक फिल्म की रिलीज की तैयारी पहले सेचल रही थी और 18 सितंबर की रिलीज को ध्यान में रखते हुए थिएटर, पीआर और दूसरी चीजों पर पैसा लगाया जा चुका था। उनका कहना है किऐसी स्थिति में फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति की मेहनत प्रभावित होती है। शर्मा ने कहा, “एक फिल्म में 100 से 200 लोगों का खून-पसीना और कमाईलगी होती है; यह उनकी सामूहिक कोशिश को दिखाती है। क्या सेंसर बोर्ड को यह अधिकार है कि वह जिसे चाहे उसे आंख मूंदकर सर्टिफिकेट दे देया जिसे चाहे उसे खारिज कर दे? क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए?”
CBFC की प्रक्रिया में मोबाइल फोन बाहर रखने के नियम ने भी शर्मा को खासा नाराज किया। उन्होंने कहा, “मैं सेंसर बोर्ड के इन नियमों से हैरानथा। मैं एक प्रोड्यूसर हूं; मेरी फिल्म की स्क्रीनिंग हो रही थी और सेंसर बोर्ड की टीम वहां बैठकर उसे देख रही थी। तो, अगर मेरे पास अपना मोबाइलफोन है तो क्या आपत्ति है?” उन्होंने स्क्रीनिंग में शामिल अधिकारियों की पहचान को लेकर भी सवाल किया और कहा कि उन्हें फिल्म देखने वालेसदस्यों के नाम तक नहीं बताए गए। उनके मुताबिक, “छह लोग मेरी फिल्म देख रहे हैं। मुझे उनके नाम तक पता नहीं चल सकते — क्या कोई ‘A, B, C’ जैसा गोपनीयता का नियम है?”
अब शर्मा ने अपनी फिल्म को रिवाइजिंग कमिटी के पास ले जाने की बात कही है और इसे फिलहाल अपनी आखिरी उम्मीद मान रहे हैं। लेकिन उनकीलड़ाई सिर्फ सहिया तक नहीं है। वह उस डर के माहौल पर भी सवाल उठा रहे हैं, जिसमें कई फिल्ममेकर CBFC से टकराव से बचने की कोशिशकरते हैं। शर्मा ने कहा, “फ़िल्म निर्माता अक्सर सेंसर बोर्ड से डरते हैं। उन्हें अपने भविष्य के प्रोजेक्ट्स — यानी दूसरी या तीसरी फ़िल्म — की चिंतारहती है और वे डरते हैं कि बोर्ड उनके साथ क्या कर सकता है। हमें कब तक डर में जीना होगा? कब तक हम इस सरकारी मशीनरी का शिकार बनतेरहेंगे?”
आखिर में शर्मा ने अपनी फिल्म का रुख बिल्कुल साफ शब्दों में रखा। उन्होंने कहा, “फ़िल्म में कहीं भी नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया गया है। हमनक्सलवाद का विरोध करते हैं; हम हिंसा का विरोध करते हैं। हम प्यार के पक्ष में हैं। यह फ़िल्म एक बहुत ही सुंदर और शानदार प्रेम कहानी है।”
उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म आदिवासी समुदाय के सामने आने वाली मुश्किलों और दुविधाओं को दिखाती है। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही हैकि अगर फिल्ममेकर आदिवासी इलाकों में जाकर वहां के लोगों और उनकी परेशानियों पर फिल्म बनाने से डरने लगेंगे, तो ऐसी कहानियां आखिर पर्देतक पहुंचेंगी कैसे? सहिया के सर्टिफिकेशन पर अब अगला फैसला क्या होता है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा, लेकिन संजय शर्मा ने यह संकेतजरूर दे दिया है कि जरूरत पड़ी तो उनकी लड़ाई सेंसर बोर्ड से निकलकर हाई कोर्ट तक जाएगी।