आजकल कई युवा भारतीय जोड़े माता-पिता बनने (कंसीव करने) में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। फर्टिलिटी विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे एक छिपा हुआ मेटाबॉलिक डिसऑर्डर (चयापचय संबंधी गड़बड़ी) है, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) कहा जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को पता भी नहीं चलता। इसमें शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन हार्मोन के प्रति सही प्रतिक्रिया देना बंद कर देती हैं, जिससे खून में शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है।
आमतौर पर लोग इंसुलिन को सिर्फ डायबिटीज से जोड़कर देखते हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी डायबिटीज होने से बहुत पहले ही शरीर के प्रजनन तंत्र (Reproductive System) को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है।
महिलाओं पर इसका क्या असर पड़ता है?
चेन्नई की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. अजंता भूपति के अनुसार, जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं, तो हमारा अग्न्याशय (Pancreas) इसकी भरपाई के लिए अधिक इंसुलिन बनाने लगता है। शरीर में इंसुलिन का यह बढ़ा हुआ स्तर प्रजनन के लिए जरूरी नाजुक हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ देता है।
- PCOS का खतरा: महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस का सीधा संबंध पीसीओएस (PCOS/PCOS) से है, जो महिलाओं में बांझपन (Infertility) का एक मुख्य कारण है। बढ़ा हुआ इंसुलिन अंडाशय (Ovaries) को अधिक मात्रा में 'एंड्रोजन' (पुरुष हार्मोन) बनाने के लिए उकसाता है।
- अंडों की गुणवत्ता पर असर: यह बढ़ा हुआ पुरुष हार्मोन ओव्यूलेशन (अंडा बनने की प्रक्रिया) को रोकता है, पीरियड्स को अनियमित करता है और अंडों की क्वालिटी को भी खराब कर देता है। जिन महिलाओं को पीसीओएस नहीं है, उनमें भी इंसुलिन रेजिस्टेंस फर्टिलिटी को कम कर सकता है।
- मिसकैरेज का डर: फर्टिलिटी इलाज के दौरान, यदि इंसुलिन रेजिस्टेंस अनियंत्रित रहे, तो भ्रूण के गर्भाशय में चिपकने (Implantation) की संभावना कम हो जाती है, जिससे मिसकैरेज (गर्भपात) और प्रेग्नेंसी के दौरान अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।
पुरुष भी हैं इसके दायरे में
फर्टिलिटी को अक्सर केवल महिलाओं से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन डॉक्टर साफ करते हैं कि इनफर्टिलिटी को हमेशा एक 'कपल प्रॉब्लम' (पति-पत्नी दोनों की समस्या) के रूप में देखा जाना चाहिए।
पुरुषों में इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण मोटापा, लंबे समय तक रहने वाली आंतरिक सूजन (Inflammation), हार्मोनल असंतुलन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ जाता है। ये सभी चीजें मिलकर स्पर्म काउंट (शुक्राणुओं की संख्या), उनकी गतिशीलता (Mobility) और डीएनए की अखंडता (DNA Integrity) को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती हैं।
मीठा न खाना ही काफी नहीं: खान-पान की बड़ी गलतफहमी
बैंगलोर की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. प्रियंका रेड्डी बताती हैं कि भारतीय युवाओं में पोषण को लेकर एक बड़ी गलतफहमी है। लोग सोचते हैं कि अगर वे सिर्फ मिठाई या चीनी खाना छोड़ दें, तो वे सुरक्षित हैं। लेकिन वे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट के खतरे को भूल जाते हैं।
रिफाइंड कार्ब्स का खतरा: हमारे रोजमर्रा के खाने में शामिल चीजें जैसे पोहा, इडली और डोसा में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। इनके सेवन से शरीर में ब्लड शुगर का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है, जो इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देता है।
इन छिपे हुए लक्षणों को न करें नजरअंदाज
इंसुलिन रेजिस्टेंस सालों तक बिना किसी बड़े लक्षण के शरीर में बना रह सकता है। हो सकता है कि कागजों पर आपकी ब्लड शुगर रिपोर्ट बिल्कुल नॉर्मल आए, लेकिन अंदरूनी सिस्टम बिगड़ रहा हो। इसके कुछ मुख्य संकेत इस प्रकार हैं:
- पेट के आसपास (Abdominal Fat) चर्बी का लगातार बढ़ना।
- अकेंथोसिस निगरिकन्स (Acanthosis Nigricans): त्वचा की परतों जैसे गर्दन, बगल या जांघों के जोड़ों की त्वचा का काला पड़ना।
- महिलाओं में पीरियड्स का अनियमित होना।
- परिवार में पहले से किसी को डायबिटीज होना।
राहत की बात: इसे ठीक किया जा सकता है
अच्छी खबर यह है कि इंसुलिन रेजिस्टेंस को लाइफस्टाइल में बदलाव करके पूरी तरह ठीक या काफी हद तक सुधारा जा सकता है।
- वजन नियंत्रित करें: शरीर के वजन को संतुलित रखने से इंसुलिन की संवेदनशीलता बढ़ती है।
- एक्टिव रहें: रोज वॉक, एक्सरसाइज या कोई भी शारीरिक गतिविधि जरूर करें।
- डाइट बदलें: रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट को कम करें। अपने खाने में फाइबर (सलाद, हरी सब्जियां) और प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं।
- तनाव और नींद: तनाव को मैनेज करें और पर्याप्त नींद लें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर कुछ दवाएं भी शुरू कर सकते हैं।
समय रहते इन बदलावों को अपनाने से न केवल माता-पिता बनने की राह आसान होती है, बल्कि भविष्य में होने वाली डायबिटीज और दिल की बीमारियों के खतरे को भी टाला जा सकता है।