इंटरनेट पर जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Generative AI) से बने घटिया, भ्रामक और स्पैम कंटेंट यानी 'AI स्लॉप' (AI Slop) की बाढ़ से न सिर्फ आम यूज़र्स परेशान हैं, बल्कि अब बड़ी टेक कंपनियां भी इसके खिलाफ 'डिटॉक्स' अभियान चलाने पर मजबूर हो गई हैं। विडंबना यह है कि प्लेटफॉर्म्स पर यह डिजिटल कचरा उन्हीं के द्वारा विकसित किए गए AI टूल्स की वजह से फैला है।
क्या है 'AI स्लॉप'?
'AI स्लॉप' का मतलब ऐसे निम्न-स्तरीय (low-grade) टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो और इमेज कंटेंट से है, जिसे AI टूल्स की मदद से थोक में और बिना किसी मानवीय गुणवत्ता जांच के केवल व्यूज, क्लिक और पैसे कमाने (clickbait) के मकसद से बनाया जाता है।
- गूगल सर्च में अजीबोगरीब भ्रामक जवाब।
- फेसबुक और सोशल मीडिया फीड्स पर अजीबोगरीब AI-जनरेटेड तस्वीरें।
- यूट्यूब और स्ट्रीमिंग ऐप्स पर थोक में अपलोड किए गए सिंथेटिक गाने व वीडियो।
टेक कंपनियों के बड़े कदम
- Spotify: म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने पिछले साल डुप्लीकेट गानों, बल्क अपलोड और स्पैम ट्रैक की श्रेणी में आने वाले करीब 7.5 करोड़ ट्रैक्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटाया।
- YouTube और Google: गूगल ने प्लेटफॉर्म पर संगठित तरीके से AI स्पैम फैलाने वाले लगभग 50,000 अकाउंट क्लस्टर्स और पिछले 6 महीनों में 1,30,000 से अधिक लो-क्वालिटी चैनलों को हटाया है। यूट्यूब के सीईओ नील मोहन ने 'AI स्लॉप' को नियंत्रित करना इस साल की शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा है।
- LinkedIn व Substack: लिंक्डइन ने यूज़र्स के लिए AI स्लॉप को रिपोर्ट करने का खास बटन पेश किया है, वहीं सबस्टैक ने फर्जी और मशीन-जनरेटेड कमैंट्स को पकड़ने के लिए डिटेक्शन टूल्स जोड़े हैं।
- Pinterest: यूज़र्स को यह चुनने की सुविधा दी जा रही है कि वे अपनी फीड में AI-जनरेटेड पोस्ट्स की संख्या को सीमित कर सकें।
क्यों बना यह बड़ा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार, अनियंत्रित AI कचरा वास्तविक मानव रचनात्मकता (human creativity) को दबा रहा है और डिजिटल सूचना तंत्र को प्रदूषित कर रहा है। यूज़र्स इस तरह के कंटेंट से तंग आ चुके हैं, जिससे प्लेटफॉर्म्स पर सक्रियता घटने का जोखिम बढ़ गया है।
हालांकि, टेक कंपनियों के लिए असली और फर्जी कंटेंट के बीच अंतर करना अब भी एक बड़ी तकनीकी चुनौती बना हुआ है।