बलूचिस्तान और पख्तूनख्वा में सरकार बेअसर, शाम के बाद थानों में दुबकती है पुलिस: मौलाना फजलुर रहमान
पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति और कानून-व्यवस्था को लेकर जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने शहबाज शरीफ सरकार और पाकिस्तानी सेना पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है. एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने देश के आंतरिक हालातों का एक स्याह हकीकतनामा पेश करते हुए दावा किया कि पाकिस्तान के कई हिस्सों से सरकार का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है.
खैबर पख्तूनख्वा में शाम के बाद अपराधियों का राज
मौलाना फजलुर रहमान ने खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत की बदहाल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा:
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थानों में कैद पुलिस: प्रांत के संवेदनशील इलाकों में हालात इतने बदतर हैं कि शाम ढलते ही पुलिस प्रशासनिक व्यवस्था संभालने के बजाय खुद को थानों के भीतर बंद कर लेती है.
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हथियारबंद समूहों का कब्जा: जब पुलिस सड़कों और चौकियों से नदारद होती है, तब हथियारबंद उग्रवादी और अपराधी तत्व खुलेआम घूमते हैं और समानांतर सरकार चलाते हैं.
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दफ्तरों तक सीमित हुकूमत: उन्होंने आरोप लगाया कि सूबे की सरकार सिर्फ राजधानी पेशावर के दफ्तरों और कागजों तक सीमित रह गई है, जमीन पर उसका कोई वजूद या असर दिखाई नहीं देता.
'बलूचिस्तान में सरकार की कोई रिट नहीं'
पख्तूनख्वा के साथ-साथ मौलाना रहमान ने बलूचिस्तान प्रांत के हालातों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि बलूचिस्तान के कई बलूच बहुल इलाके लंबे समय से इस्लामाबाद के प्रभाव से पूरी तरह बाहर हैं. वहां पाकिस्तान सरकार की कोई प्रभावी प्रशासनिक पकड़ (Writ) नहीं बची है.
पश्तून इलाकों में बिछ रही हैं लाशें: उन्होंने चेतावनी दी कि बलूचिस्तान जैसे हालात अब धीरे-धीरे पश्तून बेल्ट में भी पैर पसार रहे हैं. हाल के दिनों में पश्तून क्षेत्रों में हिंसा में भारी इजाफा हुआ है, जहां महज दो-तीन दिनों के भीतर ही 50 से अधिक शव बरामद किए गए हैं. आम नागरिक अपने प्रियजनों के शव उठाने और खौफ के माहौल में जीने को मजबूर हैं.
'सैनिकों की शहादत को राजनीतिक ढाल न बनाए सेना'
मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना (Establishment) द्वारा अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए देशभक्ति और शहादत के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई. उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि सेना के जवान अपनी नौकरी और मिलने वाले वेतन (सैलरी) के बदले देश की सीमाओं की सुरक्षा करते हैं.
यह उनका कर्तव्य है, इसलिए सेना के शीर्ष जनरलों को अपनी गलत राजनीतिक नीतियों और प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने के लिए सैनिकों की शहादत का इस्तेमाल एक "राजनीतिक ढाल" (Political Shield) के रूप में बंद कर देना चाहिए.