नई दिल्ली: भारत और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों में एक नए युग की शुरुआत करते हुए दोनों देशों ने बुधवार (15 जुलाई 2026) को अपने ऐतिहासिक व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (India-UK CECO) को विधिक रूप से लागू कर दिया है। इस विखंडनकारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते के प्रभावी होने से न केवल भारतीय व्यवसायों को ब्रिटेन के विशाल बाजार में आसान प्रवेश मिलेगा, बल्कि वहां कार्यरत हजारों भारतीय पेशेवरों को सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक बड़ा सुरक्षा कवच प्राप्त होगा। समझौते के नियमों के तहत, भारत से ब्रिटेन निर्यात होने वाले लगभग 99 प्रतिशत सामानों पर आयात शुल्क को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।
इस ऐतिहासिक व्यापार लॉजिस्टिक्स और सांख्यिकी विवरणों पर गौर करें तो द्विपक्षीय वार्ता का यह सिलसिला वर्ष 2021 में 'रोडमैप 2030' के तहत शुरू हुआ था, जो कुल 14 दौर की कड़ा वार्ताओं के बाद मई 2025 में आपसी सहमति में बदला। समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोनों देशों ने पेशेवरों के लिए 'डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन' (DCC) को मुस्तैद किया है, जिसके तहत अस्थायी रूप से काम करने वाले पेशेवरों को दोनों जगह पेंशन फंड में अंशदान करने की विवशता से मुक्ति मिलेगी और इस छूट की विधिक अवधि को 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया गया है।
सांख्यिकी विलेखों के अनुसार, वर्ष 2025 में यूके के 929 अरब डॉलर के कुल वस्तु आयात में भारत की हिस्सेदारी मात्र 1.6 प्रतिशत (15.2 अरब डॉलर) थी। इस नए शून्य-शुल्क ढांचे से भारत के उच्च रोजगार सृजन वाले क्षेत्रों जैसे परिधान, चमड़ा, फुटवियर, प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद और ऑटोमोबाइल घटकों को ब्रिटेन के बाजार में विखंडनकारी बढ़त मिलेगी। विशेष रूप से, ब्रिटेन ने पहली बार भारतीय शेफ, योग प्रशिक्षकों और शास्त्रीय कलाकारों के लिए प्रतिवर्ष 1,800 वीजा का एक विशेष कोटा आरक्षित किया है। इसके अलावा, सेवा क्षेत्र के विन्यास में आईटी, वित्तीय सेवाओं और स्वास्थ्य सहित 137 उप-क्षेत्रों को नियमों के तहत खोल दिया गया है। खेल अब पूरी तरह से इस ऐतिहासिक आर्थिक विलेख के अनुशासित क्रियान्वयन और भारतीय एमएसएमई (MSME) व स्टार्टअप्स द्वारा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी हिस्सेदारी के सांख्यिकी विस्तार पर टिका है।