अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने देश की लोकतांत्रिक और चुनावी सुरक्षा पर एक नई वैश्विक बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में दावा किया कि रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसी विदेशी ताकतें परिष्कृत साइबर हमलों के माध्यम से अमेरिकी चुनावी प्रक्रिया में सेंध लगाने और नतीजों से छेड़छाड़ करने की तकनीकी क्षमता रखती हैं। ट्रंप के इन आरोपों के बाद जहां एक ओर अमेरिकी चुनावी सिस्टम की संवेदनशीलता पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव विशेषज्ञों और एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्टों ने इन दावों को खारिज करते हुए अमेरिकी प्रणाली को दुनिया की सबसे सुरक्षित और जटिल प्रणालियों में से एक बताया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी चुनाव की सबसे बड़ी ताकत इसका विकेंद्रीकृत (Decentralized) ढांचा है। पूरे देश में किसी एक केंद्रीय संस्था के बजाय लगभग 10,000 से अधिक स्थानीय और राज्य-स्तरीय निर्वाचन क्षेत्रों में अलग-अलग नियमों के तहत मतदान कराया जाता है। इस विविधता के कारण पूरे देश के सिस्टम को एक साथ हैक करना किसी भी बाहरी ताकत के लिए लगभग असंभव है। इसके अलावा, वोटर फ्रॉड या बैलेट पेपर से छेड़छाड़ जैसे मामलों के लिए अमेरिकी कानून में बेहद कड़े जुर्माने और जेल की सजा का प्रावधान है। साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में व्यापक धांधली के ट्रंप के आरोपों को खुद उनके तत्कालीन अटॉर्नी जनरल विलियम बार और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने भी बेबुनियाद पाया था।
इस बीच, बीजिंग ने ट्रंप के इन आरोपों पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया दी है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप के दावों को "पूरी तरह मनगढ़ंत" और "आधारहीन" करार दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन की अमेरिकी आंतरिक मामलों या उनके चुनावों में हस्तक्षेप करने की न तो कोई मंशा है और न ही उसने कभी ऐसा किया है। चीन ने अमेरिका को नसीहत दी कि वह अपनी घरेलू राजनीति और चुनावी फायदों के लिए बीजिंग का नाम घसीटना बंद करे और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करे।